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आयुर्वेद में सर्जरी का विरोध, मरीज़ों की चिंता या धंधे की फ़िक्र?

केंद्र सरकार ने आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में सर्जरी की पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को भी ऑपरेशन की छूट देने का फ़ैसला किया है। आयुष मंत्रालय की संस्था सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (CCIM) ने पिछले महीने (20 नवंबर) यह आदेश जारी किया कि अब से आयुर्वेदिक डॉक्टर भी सर्जरी कर सकेंगे। अभी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसे कुछ बड़े मेडिकल संस्थानों में आयुर्वेदिक पद्धति में सर्जरी या शल्य चिकित्सा की पोस्ट ग्रेजुएट पढ़ाई होती है। आयुर्वेदिक सर्जन को सिर्फ़ आँख, कान, नाक, गला और पेट के ट्यूमर से जुड़े कुल 58 तरह के ऑपरेशन करने की ही अनुमति होगी। वो हृदय, मस्तिष्क और दूसरे अतिसंवेदनशील अंगों की सर्जरी नहीं करेंगे। लेकिन इतने से ही एलोपैथिक डॉक्टरों में हंगामा मच गया है। उनका कहना है कि आयुर्वेदिक पद्धति में सर्जरी नहीं हो सकती और इससे मरीज़ों की जान ख़तरे में पड़ जाएगी। मानो मरीज़ों के जीवन की सबसे ज़्यादा चिंता एलोपैथिक डॉक्टरों को ही हो। ऐसा लगता है कि असली चिंता मरीज़ों की नहीं, बल्कि कमाई मारे जाने की है। 

आयुर्वेदिक सिस्टम से इतना डर क्यों?

जब बाबा रामदेव ने कोरोना वायरस की आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल लॉन्च की थी, तब देश में कितना हंगामा मचा था। बाबा की दवा कितनी प्रभावी है ये तो नहीं पता, लेकिन अब तक जितनी भी एलोपैथी दवाएँ दी जा रही हैं वो सब बेकार और नुक़सानदेह साबित हो चुकी हैं। पहले मलेरिया की दवा हाइड्रोक्लोरोक्वीन दी गई, बाद में पता चला कि वो किसी काम की नहीं है। फिर दुनिया भर में रोगियों को एड्स के मरीज़ों को दी जाने वाली रेमडेसिवीर नाम की दवा खिलाई गई। कुछ दिन पहले विश्व स्वास्थ संगठन (WHO) ने कहा है कि इस दवा का रोगियों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। कुल मिलाकर दुनिया भर के एलोपैथी डॉक्टर अभी तक तुक्का ही मार रहे हैं। इस चक्कर में संक्रमित लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ हो रहा है और दवा कंपनियाँ अपनी जेब भर रही हैं। लेकिन आश्चर्य है कि बिना किसी साइड इफ़ेक्ट वाली आयुर्वेदिक दवा के ख़िलाफ़ इन्हीं एलोपैथी डॉक्टरों और दवा कंपनियों ने मोर्चा खोल लिया था। अब आयुर्वेदिक सर्जरी की बात पर देश में वही कहानी फिर से दोहराई जा रही है। 

महर्षि सुश्रुत की यह प्रतिमा ऑस्ट्रेलिया में मेलबर्न के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जरी में लगी है। पूरी दुनिया अब सुश्रुत को सर्जरी का जनक मानती है, लेकिन अपने देश में मैकाले की सताने इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं।

एलोपैथ से पुरानी आयुर्वेदिक सर्जरी

जो लोग आयुर्वेदिक चिकित्सा का विरोध कर रहे हैं उन्हें नहीं पता कि भारत में शल्य चिकित्सा हज़ारों साल से होती रही है। अंग्रेजों ने आने के बाद इस भारत की इस धरोहर को न सिर्फ़ नष्ट किया, बल्कि उसे अवैज्ञानिक भी करार दिया। भारत में ईसा से 800 साल पहले महर्षि सुश्रुत हुए थे, जिन्हें शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। उनकी पुस्तक सुश्रुत संहिता में 132 तरह के सर्जरी उपकरणों के बारे में बताया गया है। इनमें से कई आज भी प्रयोग होते हैं। वाराणसी, बेंगलुरु, जामनगर और जयपुर के आयुर्वेद संस्थानों में इनका प्रयोग भी होता है। सुश्रुत संहिता में प्लास्टिक सर्जरी के बारे में भी बताया गया है। आयुर्वेद में इसे कायाकल्प कहा जाता है। दूसरी तरफ़ एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली को मात्र 100 साल पहले तक यही नहीं पता था कि सर्जरी से पहले मरीज़ को बेहोश कैसे किया जाए। शुरू में वो रोगी को बेहोश किए बिना ही सर्जरी करते थे, जिससे वो दर्द से तड़पता रहता था और कई बार उनकी मौत भी हो जाती थी। जबकि भारत में दर्द ख़त्म करने (एनिस्थीसिया) और बेहोश करने के कई तरीक़े हज़ारों साल से प्रचलित हैं। 

प्राचीन भारत में शरीर के लगभग सभी अंगों की शल्य चिकित्सा होती रही है। इसका यह प्रतीक चित्र दिल्ली के नेशनल साइंस सेंटर में लगा हुआ है।

भारतीय ज्ञान को नष्ट करने का षड़यंत्र

यह अंग्रेज अफ़सर मैकाले की योजना थी, जिसके तहत भारत के गाँव-गांव में चल रहे गुरुकुलों को नष्ट कर दिया गया। उनकी जगह अंग्रेज़ी और उर्दू पढ़ाने वाले स्कूल खोले गए और लोगों को बताया जाने लगा कि संस्कृत में पूजा-पाठ के मंत्रों और भगवान की कहानियों के अलावा कुछ भी नहीं है। संस्कृत के पतन के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का प्रयोग भी कम होता गया। इसकी जगह अंग्रेजों ने भारत में एलोपैथिक पद्धति की दवाओं को झोंकना शुरू कर दिया। इसके कारण आयुर्वेद में नए शोध का काम लगभग ठप हो गया। आज स्थिति है कि आयुर्वेद में सर्जरी की पढ़ाई के बाद भी हज़ारों डॉक्टर उसका प्रयोग नहीं कर पाते, क्योंकि सरकार की तरफ़ से इसकी अनुमति नहीं है। अब जब इसकी शुरुआत का निर्णय लिया गया है तो मैकाले की उसी सोच से प्रभावित लोगों और डॉक्टरों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

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