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हिंदू त्यौहारों पर हमले के पीछे चर्च का ‘रोमन मॉडल’, समझिए क्या है साजिश

हर साल दिवाली के पहले ही दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण बढ़ने लगता है, लेकिन इसे लेकर असली शोर तब मचता है जब दिवाली आ जाती है। ऐसे जताया जाता है मानो सारा दोष दिवाली का है। यह अभियान इतना चौतरफा होता है कि आम लोग भी सच मान लेते हैं। होली, जल्लीकट्टू, सबरीमला मंदिर में भगवान अयप्पा की यात्रा, शनि शिंगणापुर में महिलाओं के प्रवेश, केरल के मंदिरों में हाथियों पर रोक, गणेश चतुर्थी, करवा चौथ, छठ और दही-हांडी जैसे तमाम हिंदू पर्वों पर हमले होते रहे हैं। हिंदू त्यौहारों, परंपराओं के खिलाफ पहले मीडिया की सहायता से एक दुष्प्रचार चलाया जाता है और फिर न्यायालय के जरिए उन पर प्रतिबंध लगवा दिया जाता है। यह मात्र संयोग नहीं है कि सिर्फ हिंदू त्यौहार ही इस तरह के अभियानों का शिकार बनाए जाते हैं। कभी भी बकरीद पर होने वाली गंदगी और क्रिसमस और हैलोवीन में प्लास्टिक के प्रयोग पर बात नहीं होती। भारत में लाखों मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाएं जा नहीं सकतीं। चर्च के अंदर बड़े-बड़े सेक्स स्कैंडल सामने आते रहते हैं। लेकिन मात्र 2 मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाता है। वास्तव में यह सोचा-समझा और आज़माया हुआ तरीक़ा है जिससे किसी भी धर्म और सभ्यता को नष्ट किया जा सकता है। इसके पीछे चर्च का दिमाग है और इस्लामी शक्तियों का इसे मौन समर्थन मिला हुआ है। इस पूरे षड़यंत्र को समझने के लिए आपको रोमन साम्राज्य के इतिहास के बारे में जानना चाहिए?

संस्कृति और परंपरा पर निशाना

रोमन साम्राज्य के लोग ईसाई नहीं थे। उनके अपने अलग देवी-देवता थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे हिंदू धर्म के होते हैं। लेकिन जिस योजनाबद्ध तरीके से चर्च ने रोमन साम्राज्य का सफाया किया, वही भारत में हिंदू संस्कृति के साथ किया जा रहा है। वैसे तो इसकी शुरुआत लगभग 150 साल पहले ही मैकाले और मैक्समूलर के साथ हो गई थी। जब भारतीय शिक्षा व्यवस्था, भाषा और धर्मशास्त्रों के साथ  खिलवाड़ किया गया। लेकिन अब वही अभियान अपने सबसे महत्वपूर्ण चरण में है, यानी हिंदू धर्म की सांस्कृतिक जड़ों को काटने का काम चल रहा है। हमारे त्यौहार हमारी प्राचीन संस्कृति के सबसे बड़े वाहक हैं। जब इन्हें खत्म कर दिया जाएगा तो इनसे जुड़े संगीत, नृत्य, लोककलाएं भी खुद ही लुप्त हो जाएंगी।

रोमन साम्राज्य में क्या हुआ था?

दो-ढाई हज़ार साल पहले ईसाई चर्च ने ठीक इसी तरीक़े से रोमन साम्राज्य को ख़त्म किया था। ईस्वी वर्ष 380 (CE) में रोमन सम्राट थियोडोसियस ने ईसाइयत को अपने राज्य का आधिकारिक धर्म घोषित किया था। राजा के इस आदेश को Edict of Thessalonica (थेसेलोनिका के राज्यादेश) के नाम से जाना जाता है। इसमें कहा गया कि जो लोग ईसाई धर्म में आस्था नहीं रखते उन्हें Heretic अर्थात विधर्मी माना जाएगा। ऐसे लोगों को सांसारिक और ईश्वरीय, दोनों तरह के दंड दिए जाएंगे। इसके साथ ही रोमन सभ्यता की निशानियों को मिटाने का अभियान शुरू हो गया। इसका सबसे पहला शिकार बने वो रोमन त्यौहार और परंपराएं जो उनकी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित थीं। सबसे पहले ओलिंपिक खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वर्ष 426 में सम्राट के आदेश पर ओलिंपिया के स्टेडियम को तहस-नहस कर दिया गया। इसमें एक साथ 40 हजार लोग बैठकर खेलों का आनंद लिया करते थे। आज भी ईसाई संस्थाएं इस घटना को अपनी सांस्कृतिक विजय के तौर पर गर्व के साथ बताती हैं। इसी दौर में रोमन सभ्यता की कई परंपराओं को ख़त्म कर दिया गया। इनमें बलि प्रथा, ग्रीक धार्मिक स्थलों में पूजा-पाठ भी शामिल थे। मंदिरों में लोगों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई। इसके बाद ईसाई धर्म अपना चुके लोगों को वापस अपने मूल धर्म या पेगन (Pagan) में वापस जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वर्ष 392 में रोमन ज्योतिषशास्त्र को अंधविश्वास बताकर उस पर पाबंदी लगा दी गई। रोमन देवी-देवताओं की मूर्तियां घर में रखने या उनके लॉकेट पहनने पर भी रोक लगा दी गई। इन नियमों का उल्लंघन करने पर मृत्युदंड तय किया गया।  इन कदमों का नतीजा यह हुआ कि रोमन सभ्यता पूरी तरह नष्ट हो गई और संग्रहालयों में शोभा बढ़ाने की वस्तु बनकर रह गई।

यूरोपीय देशों में आज भी जगह जगह रोमन सभ्यता के खंडहर देखे जा सकते हैं।

16वीं शताब्दी में गोवा से शुरुआत

16वीं शताब्दी में कैथोलिक धर्मगुरु सेंट ज़ेवियर (Saint Xavier) ने वही अभियान फिर से भारत के गोवा में शुरू किया था। गोवा में पुर्तगाली शासन के समय ज़ेवियर ने धार्मिक अत्याचार का जो अभियान चलाया था उसका पूरा इतिहास आज हमारी नई पीढ़ी से छिपाया जाता है। तब गोवा में हिंदुओं को घरों में भगवान की मूर्तियां रखने पर पाबंदी लगा दी गई थी। यहां तक जिन लोगों ने डरकर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया, लेकिन चोरी-छिपे हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां घर में रखते थे, उन्हें भी पकड़े जाने पर भयानक यातनाएं दी जाती थीं। कई लोगों को खुलेआम जिंदा जला दिया गया। उस दौर में गोवा में सैकड़ों हिंदू मंदिर तोड़े गए और त्यौहारों और परंपराओं को अंधविश्वास बताकर उन पर रोक लगा दी गई। तब यहां तक कि हिंदुओं को आपस में एक-दूसरे को ‘नमस्ते’ कहकर अभिवादन करने, सैंडल पहनने और घर में तुलसी का पौधा लगाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया था। जो लोग ईसाई बन गए थे वो मंदिरों की तरह ही चर्च में प्रवेश से पहले भी बाहर चप्पल उतारा करते थे, तो इस पर भी रोक लगा दी गई।

गोवा में सेंट ज़ेवियर्स के हिंदुओं पर अत्याचार की कहानियां आज भी सुनी-सुनाई जाती हैं।

भारत में चर्च की क्या है रणनीति?

भारत में सबसे पहले दही हांडी, जल्लीकट्टू और सबरीमला मंदिर में प्रवेश जैसे मुद्दे बहुत सोच-समझकर पैदा किए गए। क्योंकि ये वो लोकपर्व हैं जिनके आधार पर हिंदू धर्म एकजुट रहता है। इनमें सभी जातियों और सामाजिक समूहों के लोग बराबरी के साथ हिस्सा लेते हैं। जातियों के आधार पर हिंदू धर्म को तोड़ने के लिए ज़रूरी था कि ये लोकपर्व ख़त्म कराए जाएं। चर्च के लिए भारत इस समय सबसे बड़ा लक्ष्य है। ईसाई धर्मांतरण कार्यक्रमों पर हर साल हज़ारों करोड़ रुपये विदेशों से लाए जा रहे हैं और इनके दम पर पहले सामाजिक टकराव पैदा किया जाता है और फिर उसका फ़ायदा उठाकर धर्मांतरण कराया जाता है। उत्तर पूर्व के राज्यों जैसे नगालैंड में इसी तरीक़े से लगभग पूरा ईसाईकरण हो चुका है। अगर आपको इन बातों पर भरोसा न हो तो आपको ईसाई मिशनरियों के जोशुआ प्रोजेक्ट के बारे में जानना चाहिए। दुनिया भर में ईसाईकरण के इस अभियान का फ़ोकस ख़ास तौर पर भारत है। लेकिन भारत में जब इस अभियान के तहत कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली तो वर्ष 2004 में एक नई रणनीति बनाई गई जिसमें तय हुआ कि धर्मांतरण कराना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उसके बाद भी लोग हिंदू त्यौहारों और परंपराओं के साथ जुड़े रहते हैं। ज़रूरी है कि हिंदू धार्मिक परंपराओं को ही टार्गेट किया जाए, ताकि लोग अपने त्यौहार मनाने में शर्म महसूस करें। शिवलिंग पर दूध चढ़ाने, दही-हांडी, जल्लीकट्टू सभी पर इसके बाद ही हमले शुरू हुए।

भारत में जारी ‘प्रोजेक्ट थेसेलोनिका’

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इसका नाम प्रोजेक्ट थेसेलोनिका (Project Thessalonica) रखा गया है। यानी उनके दिमाग में यह पूरी तरह स्पष्ट है कि भारत में वो क्या कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट की प्रमुख बातें इस तरह हैं:

  1. नए हिंदू मंदिर नहीं बनने चाहिए। इसके लिए सामाजिक, सरकारी और क़ानूनी स्तर पर अभियान चलाने चाहिए।
  2. ऐसे जातियों का धर्मांतरण प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए जो पारंपरिक रूप से मिस्त्री, कारीगर और शिल्पकार का काम करती हैं। इससे नए मंदिर बनाने के लिए लोग नहीं मिलेंगे।
  3. जिन शहरों में कुंभ का आयोजन होता है वहाँ पर धर्मांतरण की ज़िम्मेदारी अमेरिका में टेनेसी प्रांत के फ़र्स्ट बाप्टिस्ट चर्च ऑफ नैशविल ने सँभाली। जो नाव चलाने वालों, पूजा सामग्री और फूल बेचने वालों को धर्मांतरित कराएँगे। ताकि वहां के धार्मिक ताने-बाने को तोड़ा जा सके।
  4. प्रोजेक्ट थेसेलोनिका में काशी के मल्लाहों का ख़ास तौर पर ज़िक्र है। इसके अनुसार मल्लाहों को ट्रेनिंग देकर दूसरे पेशे या नौकरी करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। आप वाराणसी में गंगा के किनारे मल्लाहों की किसी भी बस्ती में चले जाएं आपको चर्च और चंगाई सभाओं की भरमार दिखेगी। मल्लाहों को लालच देकर उन्हें ईसाई बनाने का काम जोरशोर से चल रहा है।
  5. पर्यावरण के लिए नाम पर एनजीओ बनाकर गणेश प्रतिमा विसर्जन, कुंभ मेला से प्रदूषण और जगन्नाथ यात्रा के ख़िलाफ़ अदालतों में याचिकाएँ डलवाई जा रही हैं, ताकि इन सभी पर या तो पूरी तरह रोक या बंदिशें लगाई जा सकें। क्योंकि जब किसी त्यौहार पर पाबंदी लगती है तो लाखों की संख्या में ऐसे लोग बेरोज़गार हो जाते हैं जिनका कामधंधा उसी से चलता है। जैसे पटाखों पर पाबंदी से तमिलनाडु के शिवकाशी में भुखमरी की नौबत आ गई है। वहाँ पर ईसाई मिशनरियों का पहुँचना शुरू भी हो चुका है।
  6. प्रोजेक्ट थेसेलोनिका के तहत ही टेलीविजन कार्यक्रमों और फ़िल्मों की कहानियों में ऐसी बातें पिरोने पर काम चल रहा है, जिससे हिंदुओं में अपनी परंपराओं और त्यौहारों को लेकर एक हीनभावना पैदा की जा सके।
  7. टीवी और फ़िल्मों की ही तरह राजनेताओें पर भारी निवेश की योजना बनाई गई। यह जानना महत्वपूर्ण है कि मिशनरी सभी पार्टियों के नेताओं को मोटी रक़म देते हैं। ताकि अगर कोई सरकार बदल जाए तब भी उनके क्रियाकलापों पर असर न पड़े।

ऊपर हमने जो बातें लिखी हैं उनका सीधे तौर पर कोई संदर्भ नहीं मिलता है, लेकिन देश में जो कुछ चल रहा है उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन बिंदुओं पर किस तरह काम हो रहा है। यह पाया गया है कि हिंदू परंपराओं और त्यौहारों के ख़िलाफ़ कोर्ट में याचिका डालने वाली अधिकतर एनजीओ को विदेशों से मोटी रक़म मिल रही थी। कई बार ये काम मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों को पैसे पहुँचाकर भी किया जाता है। इसके लिए कभी पशु अधिकार, कभी महिलाओं और बच्चों के अधिकार तो कभी पर्यावरण की आड़ ली जाती है।Dahi Handi festival celebrating in Mumbai

कुछ साल पहले तक मुंबई का दही-हांडी फेस्टिवल दुनिया भर में मशहूर हुआ करता था।

एक उदाहरण के लिए रंजना कुमार नाम की एक कथित समाजसेवी हैं जो सेंटर फ़ॉर सोशल रिसर्च नाम के एनजीओ की डायरेक्टर हैं। संस्था का दावा है कि वो महिलाओं और लड़कियों के मुद्दों पर काम करती है। इस संस्था को मिलने वाले 90 प्रतिशत से ज़्यादा फंड विदेशों से आता है। इस एनजीओ का सबसे बड़ा डोनर नीदरलैंड्स का इंटर-चर्च कोऑपरेटिव (ICCO) है। 2006 से 2016 तक रंजना कुमार के एनजीओ को लगभग 3.6 करोड़ रुपये दिए थे। इसके अलावा डोनर्स में हैन्स सीडेल फाउंडेशन भी है, जो कैथोलिक ईसाई धर्म का प्रचार करती है और उसके संबंध नव-फासीवादी संस्थाओं के साथ भी है। ऐसे भाड़े की सामाजिक संस्थाओं की भारत में संख्या लाखों में है। सवाल उठता है कि दुनिया की ये बड़ी ईसाई संस्थाएं आखिर भारत में महिलाओं के कल्याण को लेकर इतनी चिंतित क्यों हैं? जबकि अपने देशों में ये संस्थाएं खुद ही महिलाओं पर अत्याचार और पुरुषवादी सोच का प्रतीक हैं।

भारतीय परिवार व्यवस्था में महिलाओं का बहुत महत्व है क्योंकि वही धार्मिक परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती रही हैं। लिहाजा प्रगतिशीलता और महिलावाद की आड़ में हिंदू महिलाओं को यह एहसास दिलाया जा रहा है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। जबकि यही संस्थाएं कभी चर्च में ननों के शारीरिक शोषण और मुस्लिम महिलाओं के साथ तीन तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों पर कभी एक शब्द नहीं बोलतीं। अगर यह मान भी लिया जाए कि रंजना कुमारी जैसे लोग हिंदू धर्म में सुधार की कोशिश कर रहे हैं तो सवाल उठता है कि हिंदू धर्म को सुधारने के लिए कैथोलिक संस्थाएं उन्हें करोड़ों रुपये क्यों दे रही हैं? अगर मुंबई की दही हांडी की बात करें तो ये दुनिया में मानव पिरामिड बनाने का एक तरह का अनोखा खेल था। कई गोविंदा मंडलों के नाम गिनीज़ बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हैं। इसमें हिस्सा लेने और देखने के लिए दुनिया के कई देशों से पर्यटक आया करते थे। अदालत ने दही हांडी की ऊंचाई 20 फुट तय कर दी। उसके बाद से इस खेल का रोमांच खत्म हो चुका है और अब इसे देखने कोई नहीं आता। सोचिए कि ऊंची कूद के खेल में यह तय कर दिया जाए कि कोई खिलाड़ी अमुक ऊंचाई से अधिक छलांग नहीं लगा सकता तो क्या होगा? भारत के दही-हांडी की तरह ही स्पेन के बार्सिलोना में भी मानव पिरामिड बनाने की प्रतियोगिता होती है। वहां भी सबसे ऊपर किसी बच्चे को चढ़ाया जाता है, लेकिन भारत में इस पर पाबंदी लगा दी गई। अब सबसे ऊपर जाने वाला 18 साल से अधिक का होना चाहिए। इस साजिश का मुकाबला कैसे करें?अदालतों से लगवाए गए प्रतिबंध को हटाने का सबसे आसान तरीका है कि सरकार उससे जुड़े कानूनों में संसद के जरिए परिवर्तन कर दे। लेकिन बीजेपी सरकार ने अब तक इस दिशा में कुछ नहीं किया है। ऐसे में आम लोगों और हिंदू संगठनों की जिम्मेदारी है कि वो धार्मिक स्वतंत्रता के इस मुद्दे पर अधिक सजग रहें, ताकि सरकारों पर दबाव बने।

(वेबसाइट IndiaFacts.Org की रिपोर्ट पर आधारित)

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