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क्या सच में कैलाश पर्वत पर शिव रहते हैं?

कहते हैं कि भगवान शिव कैलाश पर्वत पर रहते हैं। हर आस्थावान हिंदू अपने जीवन में एक बार वहाँ जाने का सपना देखता है। पिछले साल मुझे कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने का मौक़ा मिला। मेरे अंदर आस्था तो थी, लेकिन उत्सुकता उससे भी ज़्यादा थी। सबसे बड़ी उत्सुकता यही कि क्या वास्तव में भगवान शिव एक पहाड़ पर सशरीर रहते हैं? अगर हाँ तो वो दिखाई क्यों नहीं देते? रहने के लिए कैलाश ही क्यों? यही सारे सवाल लिए मैंने कैलाश मानसरोवर यात्रा का मन बनाया। विदेश मंत्रालय हर साल इस यात्रा का आयोजन करता है। मैं उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग से जाने वाले 15वें बैच का सदस्य था। ये वो रास्ता है जिससे प्राचीन काल से ऋषि-मुनि कैलाश यात्रा पर जाया करते थे। ये सबसे कठिन रास्ता है। हालाँकि अब सिक्किम और नेपाल के आसान रास्तों भी कैलाश मानसरोवर तक जाया जा सकता है।

शिव की शक्ति का अनुभव

कैलाश मानसरोवर दिव्य स्थान हैं। इसकी अनुभूति कोई भी सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है। शिव कैलाश पर्वत पर रहते हैं या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन वहां शिव की शक्तियों का अनुभव जरूर होता है। कैलाश पर्वत में एक अदृश्य आकर्षण है जो आपको अपनी तरफ़ खींचता है। कैलाश से कुछ दूरी पर दो झीलें हैं- मानसरोवर और राक्षसताल। कैलाश पर्वत पर जमा बर्फ़ पिघलती रहती है और उसका पानी इन दोनों झीलों में पहुंचता रहता है। मानसरोवर का जल मीठा है, जबकि राक्षसताल का पानी खारा है। 15 हजार फीट ऊँचाई पर बिल्कुल विपरीत प्रवृत्ति की ऐसी झीलों का होना ही अपने-आप में रहस्य है। मानसरोवर के जल में गंगा जल के गुण होते हैं। यह कभी ख़राब नहीं होता। लोग इसका जल बोतलों में भरकर अपने साथ लेकर जाते हैं। शायद इसी कारण बहुत सारे लोग मानते हैं कि गंगा नदी का उद्गम कैलाश मानसरोवर से ही होता है।  यहाँ से भूमिगत मार्ग से वो गोमुख तक पहुँचती है।

बहुत तेज़ी से बीतता है समय

किसी जंगल या पहाड़ी इलाके में जाएं तो लगता है कि दिन कितना लंबा है और समय कट ही नहीं रहा। लेकिन मैंने और कई लोगों ने महसूस किया है कि कैलाश मानसरोवर के क्षेत्र में समय बहुत जल्दी-जल्दी बीतता है। पूरा दिन कब ख़त्म हो जाता है पता नहीं चलता। कैलाश मानसरोवर के क्षेत्र में मैंने जो 5-6 दिन बिताए, उनके बाद यह अनुभव किया कि मेरे नाखून और दाढ़ी-बाल बहुत तेज़ी से बढ़ चुके थे। कई और तीर्थयात्री इस अनुभव की पुष्टि करते हैं। कैलाश मानसरोवर पर लिखी गई कई किताबों में भी यह बताया गया है कि यहाँ पर समय की चाल अलग है। ऐसा अनुभव होने का अगर कोई वैज्ञानिक कारण है तो वो मुझे पता नहीं।

क्या वाक़ई शिव वहाँ रहते हैं?

इस पूरी यात्रा में इस सवाल का जो जवाब मुझे मिला वो मैं अपने अनुभवों के आधार पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं। आप इनका मतलब अपने हिसाब से समझने के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मुझे लगता है कि ईश्वर का अनुभव व्यक्तिगत मामला है। ज़रूरी नहीं कि दो लोगों के अनुभव एक जैसे हों। यात्रियों का दल उत्तराखंड में धारचूला तक गाड़ियों से जाता है, लेकिन उसके बाद असली पैदल यात्रा शुरू होती है। यह पूरा रास्ता ऊँचे पहाड़ों पर चढ़ाई और उतार वाला है। रास्ते में काली नदी आपके साथ चलती है। अपने जीवन में इससे पहले मैंने इतनी तेज़ बहाव वाली गरजती हुई नदी नहीं देखी थी। ऊँचे पहाड़ी रास्ते ऐसे हैं कि कई जगह अगर जरा सा पैर फिसला तो सीधे सैकड़ों फ़ीट नीचे काली नदी में गिरेंगे। इस रास्ते पर चार-पांच पड़ावों पर रुकते हुए आप 17 हज़ार फ़ीट से भी ऊँचे लिपुलेख दर्रे को पार करते हुए तिब्बत के इलाक़े में प्रवेश करते हैं। कैलाश मानसरोवर तक के इस पूरे रास्ते पर चलते हुए ही शिव की सत्ता का अंदाज़ा लग जाता है। ये रास्ता आपको चुनौतियाँ देता है। इसके ख़तरे आपको डराते हैं। लेकिन जैसे ही हौसला टूटने को होता है कोई दृश्य या अदृश्य शक्ति आपकी कुछ इस तरह से सहारा देती है कि आप दोबारा उठ खड़े होते हैं। कभी जब पूरा दिन चलते-चलते थक कर पैर थमने लगे तो अचानक पीछे से तेज़ हवा धक्का देकर चलाने लगी। लगा कि वो हवा ही तो शिव थी। कभी कोई अनजान आदमी आपके हाथ पकड़कर लैंडस्लाइड में टूटा हुआ रास्ता पार करा देता है, तो लगता है कि वो शिव ही है। ऐसी ही सबकी अपनी-अपनी ढेरों कहानियाँ मिलेंगी।

शिव का वास्तविक साक्षात्कार

तिब्बत में दारचेन नाम की जगह से कैलाश की परिक्रमा शुरू होती है। लगभग 52 किलोमीटर की इस  परिक्रमा का 40 किलोमीटर हिस्सा पैदल पार करना होता है। परिक्रमा के पहले दिन दारचेन से डेरापुक नाम की जगह तक का 12 किलोमीटर का सफ़र तय करना होता है। इसी दिन आपको कैलाश के वो दर्शन होते हैं जिसकी फोटो हम देखते हैं। कोई चाहे तो यात्रा के मार्ग से क़रीब 3-4 किलोमीटर कैलाश पर्वत की तलहटी तक जाकर उसे छू भी सकता है। इसे चरण स्पर्श कहते हैं। यही वो दिन होता है जब आप यह अनुभव कर रहे होते हैं कि कोई ऐसी शक्ति मेरे सामने है जो दिखाई तो नहीं दे रही, लेकिन आत्मा उसे अनुभव कर रही है। ऐसा लगता है कि हमारी इंद्रियों की एक सीमा है। अस्तित्व का कोई ऐसा आयाम है जो सामने होकर भी दिख नहीं रहा। उसी शक्ति के प्रतीक के तौर पर सामने कैलाश पर्वत होता है। कई लोग इस दौरान फूट-फूटकर रो पड़ते हैं। बताया जाता है कि कैलाश पर्वत पर आज तक कोई चढ़ नहीं पाया। कोशिशें बहुत हुईं लेकिन सफलता किसी को नहीं मिली। कैलाश कोई बहुत ऊँचा पर्वत नहीं है, दुनिया की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट पर हज़ारों लोग चढ़ चुके हैं, लेकिन कैलाश तो मानो किसी और ही दुनिया में है।

ब्रह्मांड की धुरी है कैलाश पर्वत

जब आप यहाँ से जाते हैं तो यह जगह पीछे छूट नहीं जाती। ये पूरे जीवन आपके साथ आपके व्यक्तित्व और अस्तित्व का हिस्सा बनकर रहती है। परिक्रमा पूरी करके आप कैलाश यात्रा के दूसरे चरण यानी मानसरोवर के तट पर पहुँचते हैं। कहते हैं कि ये देवताओं की झील है। यहाँ वो हर दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के लिए आते हैं। यात्रियों को दिन में झील के पानी से स्नान का मौक़ा मिलता है।  अब मेरा पूरा विश्वास है कि कैलाश पर शिव रहते हैं। लेकिन इसका मतलब वो नहीं है जो हम समझते हैं। शिव कैलाश पर रहते हैं, लेकिन पूरा विश्व उन्हीं का विस्तार है। धरती का हर कण कैलाश है और हर जीव शिव है। दूसरी तरह से कहें तो यह पूरी प्रकृति ही शिव है। इस कथन का अर्थ क्या है यह भी कैलाश के सामने खड़े होकर उसे निहारते हुए ही समझ में आया। कैलाश यात्रा से कोई उम्मीद लगाने से पहले यह याद रखिए कि वहां जाकर या मानसरोवर में डुबकी लगाकर हम कर्मों से मुक्ति नहीं पा सकते। कैलाश सिर्फ यह अवसर देता है कि जान सकें कि हम कौन हैं और ईश्वर से हमारा क्या रिश्ता है।

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